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Wednesday, June 23, 2010

ज़िन्दगी को उसकी कहानी कहने देते हैं,
चलो हम अपने शिकवे रहने देते है।

सच और झूंठ का फ़र्क तो फ़िर होगा,
दोस्तों को उनकी बात कहने देते है।

बुज़ुर्गों पे चलो इतना अहसान करें 
बुढापे में उन्हे पुराने घर में रहने देते है।

दर्द में भी खुशी तलाश तो ली थी,
ख्याब मुझको कहां खुश रहने देते है?

5 comments:

  1. वाह्…………।बहुत सुन्दर्।

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  2. बहुत खूबसूरत अल्फ़ाज़।

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  3. अर्चना तिवारी said...
    बुज़ुर्गों पे चलो इतना अहसान करें
    बुढापे में उन्हे पुराने घर में रहने देते है।....बहुत खूब

    June 25, 2010 9:53 AM

    माधव said...
    reality song

    June 25, 2010 10:57 AM

    shama said...
    ज़िन्दगी को उसकी कहानी कहने देते हैं,
    चलो हम अपने शिकवे रहने देते है।
    Bahut,bahut khoobsoorat khayal!

    June 25, 2010 11:49 AM

    Indranil Bhattacharjee ........."सैल" said...
    दर्द में भी खुशी तलाश तो ली थी,
    ख्याब मुझको कहां खुश रहने देते है?

    बहुत सुन्दर पंक्तियाँ !

    June 26, 2010 10:00 AM

    Tripat "Prerna" said...
    wah wah! kya baat hai!

    June 27, 2010 3:31 AM

    psingh said...
    सुन्दर और मधुर रचना
    आभार

    June 28, 2010 1:26 AM

    Virendra Singh Chauhan said...
    Bahut badiya sir ji..... aise hi likhte raho.

    June 28, 2010 6:18 AM

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  4. "कविता" पर आपने सराहते हुये कहा:


    शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' said...
    सच और झूंठ का फ़र्क तो फ़िर होगा,
    दोस्तों को उनकी बात कहने देते है।

    बुज़ुर्गों पे चलो इतना अहसान करें
    बुढापे में उन्हे पुराने घर में रहने देते है।

    बहुत अच्छे हैं दोनों शेर. मुबारकबाद

    June 28, 2010 10:39 AM


    ana said...
    bahut sundar likhaa hai aapne

    June 30, 2010 10:12 AM


    Madhu chaurasia, journalist said...
    अच्छी कविता...वाह

    June 30, 2010 11:50 AM


    शारदा अरोरा said...
    चलो कुछ यूँ कर लें ...थोड़ी खुशफहमियाँ मुट्ठी में भर लें ...

    सुन्दर लिखा है आपने

    July 1, 2010 12:23 AM

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